प्रेगनेंसी में सताती है चिंता! किसी को फिजिक बिगड़ने की, तो किसी बेटा-बेटी के जन्म की, स्क्रीनिंग में सामने आई ये बातें

महिला के गर्भवती होने पर आंगन में किलकारी गूंजने की खुशी होती है तो कुछ बातें चिंता में भी डाले रहती हैं। किसी को यह चिंता सताती रहती है कि बेटा होगा या बेटी, कुछ महिलाएं इस तनाव में रहती हैं कि नार्मल डिलिवरी होगी या सीजर। वहीं कुछ इस कारण भी परेशान रहती हैं कि गर्भावस्था के बाद उनकी फिजिक तो नहीं खराब हो जाएगी।
मध्य प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा शासकीय अस्पतालों में आने वाली 9600 गर्भवती और प्रसूताओं की स्क्रीनिंग की है, दो प्रतिशत में इस तरह की समस्याएं मिलीं। बता दें कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने मातृत्व मानसिक स्वास्थ्य माड्यूल शुरू किया है, जिसमें गर्भवती महिलाओं और प्रसूताओं की काउंसलिंग कर मानसिक समस्याएं जानी जाती हैं और उनका उपचार किया जाता है।
कुछ को प्रसव के बाद बच्चे का ध्यान रखने की चिंता
गर्भावस्था से लेकर प्रसव के बाद तक महिलाओं को चिंता, अवसाद, मतिभ्रम (साइकोसिस) जैसी कई मानसिक समस्याएं घेर रही हैं। इसकी वजह यह भी है कि इस अवधि में उनके शरीर में हार्मोन संबंधी कई परिवर्तन होते हैं। नींद भी प्रभावित होती है।
महिलाओं की काउंसिलिंग करने वाले क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. राहुल शर्मा बताते हैं कि कई महिलाएं इस कारण अवसाद में चली जाती हैं कि ससुराल वाले उसका ध्यान नहीं रख रहे। कुछ को प्रसव के बाद की चिंता सताती है कि वह अपने बच्चे का ठीक से देखभाल कर पाएंगी या नहीं।
केस 1 : पहली बार गर्भवती हुई युवती काटजू अस्पताल में प्रसव पूर्व जांच के लिए पहुंची। यहां काउंसलर के यह पूछने पर प्रेगनेंसी के बाद तनाव तो नहीं है वह फफक पड़ी। बोली, पति किसी और को चाहता है। हम प्रेगनेंसी नहीं चाहते थे। अब चिंता है कि मेरे बच्चे का क्या होगा।
केस 2 : एक महिला इस कारण बहुत अधिक अवसाद में है कि पति शराब पीता है। प्रसव के दौरान भी वह अस्पताल नहीं आया। ऐसा न हो कि वह शराब के नशें में बच्चे को मार दे। महिला के साथ उसके पति व अन्य स्वजन की काउंसिलिंग की गई।
पारिवारिक के साथ एनीमिया भी बड़ा कारण
एनएचएम में वरिष्ठ संयुक्त संचालक (मातृत्व स्वास्थ्य) डॉ. अर्चना मिश्रा का कहना है कि गर्भवती महिलाओं में मानसिक समस्याओं के पारिवारिक कारण भी होते हैं। जैसे किसी के पहले से दो-तीन बेटियां हैं, कई बार परिवार सहयोग नहीं करता। काम का बोझ भी अवसाद का कारण बनता है। एनीमिया भी इसका बड़ा कारण हैं, जिसमें चिड़चिड़ापन बढ़ता है।
मनहित एप के अतिरिक्त सामान्य प्रश्नों वाले मानक टूल हैं, जिनके उत्तर से मानसिक समस्याओं का पता लगाना आसान है। मन कक्ष में भी डाक्टरों की पूरी कोशिश रहती है कि काउंसिलिंग से ठीक किया जा सके। डॉ. मिश्रा ने कहा, आगे चलकर सिविल अस्पताल, सीएचसी में भी काउंसिलिंग की सुविधा शुरू करेंगे।
गंभीर समस्या वाली महिलाओं को काउंसिलिंग के बाद उपचार भी दिया जा रहा
एनएचएम के अधिकारियों ने बताया कि सबसे पहले गर्भवती महिलाओं और प्रसूताओं की नर्सिंग ऑफिसरों द्वारा स्क्रीनिंग की जाती है। गंभीर लक्षण जैसे अनिद्रा आदि की स्थिति में उन्हें जिला अस्पतालों में बनाए गए मनकक्ष में भेजा जाता है।
यहां मनोचिकित्सक व मनोरोग में प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी उन्हें देखते हैं। फिर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट द्वारा काउंसिलिंग की जाती है। दवाएं भी दी जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम ‘मनहित’ एप बनाया है।
इसमें कुछ प्रश्नों के उत्तर देने के बाद एक स्कोर तैयार होता है। इसके आधार पर कुछ हद तक यह पता करना आसान हो जाता है कि व्यक्ति को मानसिक समस्याएं तो नहीं हैं।





