कहीं आप भी इसके शिकार तो नहीं? सोशल मीडिया की नेगेटिविटी आपके दिमाग को कर रही खोखला…..

आज के डिजिटल युग में हमारी सुबह सूरज की किरणों से नहीं, बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन से होती है। सुबह की पहली ‘स्क्रॉलिंग’ हमें कभी राजनीतिक युद्ध, कभी किसी भयावह हादसे, तो कभी नफरत भरी बहसों के बीच ले जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह सिर्फ एक पोस्ट आपके दिमाग के लिए एक ‘खतरे की घंटी’ की तरह है।
जब हम सोशल मीडिया पर लगातार हिंसा या तनावपूर्ण कंटेंट देखते हैं, तो हमारा मस्तिष्क इसे वास्तविक खतरा मानकर कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) रिलीज करने लगता है। यह स्थिति हमें हर वक्त घबराहट और बेचैनी के घेरे में रखती है।
डूमस्क्रॉलिंग और रेज बेटिंग का जाल
हम अक्सर खुद को बुरी खबरों के अंतहीन चक्र में फंसा हुआ पाते हैं, जिसे ‘डूमस्क्रॉलिंग’ कहा जाता है। हमारा दिमाग सतर्क रहने के लिए बुरी खबरों को ज्यादा तवज्जो देता है, जिससे नींद की कमी और मानसिक थकान होने लगती है।
वहीं, आजकल ‘रेज बेटिंग’ का चलन बढ़ा है- यानी जानबूझकर ऐसा कंटेंट बनाना जिससे आपको गुस्सा आए। यह केवल एंगेजमेंट बढ़ाने का जरिया है, लेकिन आपके लिए यह हाई बीपी और बढ़ते तनाव का कारण बनता है।
दूसरों से तुलना से पैदा होता है डिप्रेशन
दूसरों की ‘फिल्टर’ की गई जिंदगी से खुद की तुलना करना हीन भावना और डिप्रेशन को जन्म देता है। इससे भी अधिक डरावना पहलू यह है कि लगातार दुखद कंटेंट देखने से हमारा दिमाग सुन्न होने लगता है, जिससे दूसरों के प्रति हमारी सहानुभूति खत्म हो जाती है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन घर कर जाता है।
क्या है बचाव का रास्ता?
सोशल मीडिया के इस नेगेटिव प्रभाव से बचने के लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स’ और जागरूक कंटेंट कंजम्पशन अनिवार्य है। याद रखें, आपका मानसिक स्वास्थ्य आपकी न्यूजफीड से कहीं ज्यादा कीमती है।





