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मासूम अनाथ को सरकारी योजनाओं का नहीं मिल पा रहा कोई लाभ

बच्चों के माता-पिता दोनों नहीं थे दादी के साथ पिछले पांच साल से बेहद मुश्किल हालात में जीवन गुजार रहे

राष्ट्र आजकल प्रतिनिधि। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़ क्षेत्र के भगवानपुरा गांव में चार मासूम बच्चे पिछले पांच साल से बेहद मुश्किल हालात में जीवन गुजार रहे हैं. कोरोना काल 2020 में इन बच्चों ने माता-पिता दोनों खो दिए.भीलवाड़ा मांडलगढ़ के कोटड़ी क्षेत्र के भगवानपुरा गांव में चार मासूम बच्चे पिछले पांच साल से ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, जो किसी के भी दिल को दहला दे. कोरोना काल के 2020 में इन बच्चों ने माता-पिता दोनों खो दिए. तब से वे अपनी बुजुर्ग दादी के साथ रहते हैं, जो खुद चलने-फिरने की हालत में नहीं हैं. न इनके सिर पर पक्का छत है, न खाने-पीने की स्थायी व्यवस्था. कच्ची झोपड़ी में गुजर बसर कर रहे ये बच्चे पड़ोसियों की मदद से किसी तरह पेट भर पाते हैं.ये बच्चे हैं – चार भाई-बहन, जिनकी उम्र 8 से 14 साल के बीच है. वे पढ़ना-लिखना चाहते हैं, समाज की मुख्यधारा में आना चाहते हैं, लेकिन गरीबी और लाचारी ने उन्हें इतना कमजोर कर दिया है कि स्कूल जाना भी मुश्किल हो रहा है. सरकारी योजनाओं जैसे पालनहार, अनाथ बच्चों के लिए पेंशन या आवास योजना का लाभ इन्हें नहीं मिला. बाल अधिकार संरक्षण कानून की बातें इनके लिए दूर की कौड़ी बनी हुई हैं।

ये बच्चे हैं – चार भाई-बहन, जिनकी उम्र 8 से 14 साल के बीच है. वे पढ़ना-लिखना चाहते हैं, समाज की मुख्यधारा में आना चाहते हैं, लेकिन गरीबी और लाचारी ने उन्हें इतना कमजोर कर दिया है कि स्कूल जाना भी मुश्किल हो रहा है. सरकारी योजनाओं जैसे पालनहार, अनाथ बच्चों के लिए पेंशन या आवास योजना का लाभ इन्हें नहीं मिला. बाल अधिकार संरक्षण कानून की बातें इनके लिए दूर की कौड़ी बनी हुई हैं हाल ही में मुख्यमंत्री की प्रस्तावित सभा स्थल का जायजा लेने भीलवाड़ा कलेक्टर जसमीत सिंह संधू मांडलगढ़ पहुंचे थे. तभी ये चारों बच्चे उनके पास पहुंच गए और अपनी पीड़ा सुनाई. रोते-बिलखते उन्होंने बताया कि न घर है, न खाना-पानी की पक्की व्यवस्था. पड़ोसी कभी-कभी मदद कर देते हैं, वरना भूखे सोना पड़ता है. दादी की तबीयत भी खराब रहती है, वे खुद कुछ कर नहीं पातीं.

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