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फिल्मी परिवार में जन्म लेने के बावजूद काफी संघर्ष:कपूर खानदान का वो चिराग जिसने खूब किया स्ट्रगल

बॉलीवुड के सबसे बड़े फिल्मी परिवार में एक कपूर परिवार है, जिसके हर पीढ़ी ने फिल्मों पर राज किया है। वहीं आज हम यहां बात कर रहे हैं इस परिवार के उस एक्टर की जिन्हें इस फिल्मी परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। कई बार ऐसा होता कि दर्शक उन्हें देखने के बाद चेहरा तो पहचानते थे लेकिन नाम याद नहीं रहता था।

बॉलीवुड में कपूर खानदान का नाम आते ही बड़े-बड़े सितारे और फिल्मी कहानी याद आ जाती है। इस खानदान ने सिनेमा को कई सुपरस्टार दिए। पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक कई नाम हैं, जिनके अभिनय और पर्सनैलिटी ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। इस शानदार परिवार में भी एक ऐसा सदस्य था, जो लंबा करियर होने के बावजूद कभी पूरी पहचान नहीं बना सका।

वो थे रविंद्र कपूर, जो पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई और जाने-माने कैरक्टर आर्टिस्ट कमल कपूर के भाई थे। रविंद्र कपूर ने फिल्मों में चार दशक से ज्यादा समय तक काम किया, लेकिन उनके कई किरदार इतने छोटे और बिना नाम के थे कि दर्शक अक्सर उन्हें पहचान तो लेते थे, लेकिन नाम नहीं जान पाते थे।

उन्होंने पंजाबी सिनेमा की ओर रुख किया

रविंद्र कपूर का जन्म 15 दिसंबर 1940 में हुआ था। फिल्मी परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने साल 1953 में ‘ठोकर’ फिल्म से एक्टिंग की शुरुआत की। इसके बाद वह ‘पैसा’ (1957) जैसी फिल्मों में भी छोटे रोल में नजर आए। उस समय उन्हें हिंदी फिल्मों में ज्यादा मौके नहीं मिले, इसलिए उन्होंने पंजाबी सिनेमा की ओर रुख किया। पंजाबी फिल्मों में उन्होंने अपनी पहली बड़ी सफलता 1960 में आई फिल्म ‘चंबे दी कली’ से पाई। यह फिल्म हिट हुई और उन्हें कई सम्मान भी मिले।

किरदार इतना छोटा होता था कि उनका नाम तक नहीं होता

हिंदी सिनेमा में वापसी के बाद रविंद्र कपूर ने कई बड़ी फिल्मों में काम किया। वे ‘यादों की बारात’, ‘आया सावन झूम के’ और ‘कारवां’ जैसी सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा रहे। खासकर ‘कारवां’ में उन्होंने जितेंद्र के दोस्त का किरदार निभाया, जो दर्शकों को काफी पसंद आया। लेकिन उनके इन किरदारों का नाम अक्सर क्रेडिट रोल में भी नहीं दिखाया गया। कभी-कभी उनका किरदार इतना छोटा होता था कि उनका नाम तक नहीं होता था। ऐसे में दर्शक उन्हें देखने के बाद चेहरा तो पहचानते थे, लेकिन नाम याद नहीं रहता था। यही रविंद्र कपूर के करियर की सबसे बड़ी चुनौती रही।

सफलता के बावजूद उनका नाम चर्चा में नहीं आया

उनकी फिल्में हर साल आती रहीं, लेकिन वे अक्सर सपोर्टिंग रोल तक ही सीमित रहे। 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने ‘मंजिल मंजिल’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, और ‘कयामत से कयामत तक’ जैसी फिल्मों में भी काम किया। इन फिल्मों की सफलता के बावजूद उनका नाम चर्चा में नहीं आया। यह भी सच है कि राज कपूर की कंपनी आरके फिल्म्स में भी उन्हें कभी काम करने का मौका नहीं मिला। इस वजह से रविंद्र कपूर हमेशा एक प्रतिभाशाली लेकिन गुमनाम एक्टर की तरह रहे।

उनका फोकस हमेशा फिल्मों पर रहा

उनके करियर में अवॉर्ड या बड़े सम्मान नहीं आए, लेकिन उनका योगदान फिल्मों में महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने 1980 तक फिल्मों में काम किया और अपनी अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। उनकी आखिरी फिल्म ‘बेनाम बादशाह’ (1991) थी। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे इंडस्ट्री से दूरी बना ली। रविंद्र कपूर का निधन 70 साल की उम्र में 3 मार्च 2011 को हुआ।

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