
भारतीय लोककथाओं और ग्रामीण जीवन में मेंढक केवल एक जीव नहीं, बल्कि मानसून के आगमन के शुभ संकेतक माने जाते हैं। जब भीषण गर्मी के बाद आसमान से राहत की बूंदें नहीं बरसतीं, तो भारत के कई राज्यों में किसान एक अनोखा मार्ग चुनते हैं – मेंढकों का विवाह। असम के ‘भेकुली बिया’ से लेकर कर्नाटक के ‘मंडूका परिणय’ तक, यह अनुष्ठान सूखे से निपटने की एक सांस्कृतिक ढाल है।
क्यों रचाया जाता है मेंढकों का ब्याह?
यह एक प्राचीन लोक रिवाज है, जिसमें नर और मादा मेंढक का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार कराया जाता है। इसके पीछे कई धार्मिक और व्यावहारिक कारण हैं…
इंद्र देव को प्रसन्न करना: ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, मेंढक की टर्राहट वर्षा के देवता इंद्र और वरुण तक संदेश पहुँचाती है। माना जाता है कि इस शादी से मेंढक खुश होकर टर्राते हैं, जिससे देवता प्रसन्न होकर वर्षा करते हैं।
प्रकृति का चक्र: मानसून मेंढकों का प्रजनन काल होता है। इस समय उनका टर्राना प्राकृतिक रूप से बारिश का संकेत है, जिसे ग्रामीणों ने एक उत्सव का रूप दे दिया है।
आस्था का मिश्रण: हालांकि इसका उल्लेख वेदों में नहीं है, लेकिन यह आदिवासी परंपराओं और कृषि प्रधान समाज की स्थानीय मान्यताओं का अनूठा संगम है।





