झिझिया नृत्य को सिर्फ महिलाएं ही क्यूं करती हैं, जानकर आप भी हो जाएंगे हैरान
आइए जानें कैसे हुई थी झिझिया नृत्य की शुरुआत और क्यों है ये इतना खास।

राष्ट्र आजकल प्रतिनिधि | बिहार की लोकसंस्कृति की बात करें, तो झिझिया का नाम लेना काफी जरूरी है। मिथिला क्षेत्र से मशहूर हुआ ये नृत्य खासतौर से नवरात्र के दौरान किया जाता है। हालांकि, ये सिर्फ एक डांस नहीं है, इसके पीछे बहुत खास वजह छिपी है। झिझिया मैथिली शब्द झिझ से बना है, जिसका मतलब होता है रोशनी या दीया। इन नृत्य में महिलाएं सिर पर दीए से जलता मटका लेकर नृत्य करती हैं। इसलिए इसका नाम झिझिया पड़ा। झिझिया नृत्य मनोरंजन से कम और लोक आस्था से ज्यादा जुड़ा है।
दरअसल, पुराने समय में मिथिलाचंल में ऐसी मान्यता थी कि नवरात्र के दौरान टोने-टोटके, डायन, बुरी नजर और काले जादू का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे में इन बुरी शक्तियों के दुष्प्रभाव अपने बच्चों, परिवार और गांव को बचाने के लिए महिलाओं ने \ ब्रह्म बाबा और देवी भगवती की पूजा के लिए इस नृत्य की शुरुआत की। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी गीतों के जरिए आगे बढ़ता गया और आज भी बिहार में इस नृत्य को नवरात्र के समय किया जाता है। महिलाएं अपने बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए झिझिया करती हैं। इसमें मिट्टी के एक घड़े का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें बहुत सारे छेद होते हैं और इसके अंदर जलता हुआ दीया रखा जाता है। ये मटका ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है और इसके अंदर रखा दीया देवी दुर्गा का, जो दर्शाता है कि पूरा ब्रह्मांड मां भगवती की शक्ति से ही चल रहा है। ऐसा भी माना जाता है कि इस मटके से निकलती रोशनी बुरी शक्तियों को दूर करती है
झिझिया के लिए महिलाएं लाल, पीले जैसे चटकीले रंग की साड़ी पहनती हैं, जिसका पल्ला आगे की ओर मैथिली स्टाइल में किया जाता है। इसके साथ पारंपरिक गहने, जैसे मांग टीका, गले में हंसुली, चूड़ियां, पायल, कमरबंध और नथ पहनती हैं। झिझिया नृत्य में महिलाएं सिर पर तेल से भरा जलता हुआ दीपक एक मटके में रखकर नृत्य करती हैं। इस मटके को बैलेंस करते हुए ये नृत्य गोलाकार में किया जाता है। महिलाओं का समूह ढोलक और हार्मोनियम की धुन पर गोल घेरे में हाथों और कदम की ताल मिलाते हुए नृत्य करती हैं।





