Period leave : क्या देश में पीरियड लीव देते हैं? देखते हैं कहां-कहां रहती है यह छुट्टी

भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर उनकी भागीदारी को लेकर एक पुरानी बहस फिर से चर्चा में है- ‘पीरियड लीव’ (मासिक धर्म की छुट्टी)। क्या यह महिलाओं का अधिकार है या उनके करियर के लिए एक नई बाधा? फिलहाल, भारत में इसे लेकर कोई केंद्रीय कानून नहीं है, लेकिन देश के कई हिस्सों में ‘चुप्पी’ टूट रही है और नीतियां बदल रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट के सामने देशव्यापी ‘मेंस्ट्रुअल लीव’ नीति बनाने की याचिका आई, तो अदालत ने एक गंभीर पहलू की ओर इशारा किया। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए टिप्पणी की कि यदि इसे कानूनन अनिवार्य कर दिया गया, तो संभव है कि कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से हिचकने लगें। अदालत का मानना है कि इस संवेदनशील विषय पर सरकार और संबंधित विभागों को सभी पक्षों से परामर्श कर नीति बनानी चाहिए, न कि कोर्ट को इसे थोपना चाहिए।
संसद से शुरू हुई पहल
देश में कानून बनाने की सबसे बड़ी कोशिश साल 2022 में हुई। सांसद हिबी ईडन ने संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया, जिसमें कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए हर महीने 3 दिन की छुट्टी का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि यह बिल अभी कानून की शक्ल नहीं ले पाया है, लेकिन इसने राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय पर चर्चा के द्वार खोल दिए।
बिहार से कर्नाटक में छुट्टी
भले ही दिल्ली (केंद्र) की ओर से कोई आदेश न हो, लेकिन कई राज्यों ने अपनी महिला शक्ति के लिए मिसाल पेश की है:
बिहार (1992 से मिसाल): बिहार इस मामले में सबसे क्रांतिकारी रहा है। यहां लालू प्रसाद यादव की सरकार के समय से ही महिला कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की विशेष छुट्टी दी जा रही है।
कर्नाटक (2025 का ऐतिहासिक फैसला): कर्नाटक ने हाल ही में इतिहास रच दिया है। साल 2025 में यह देश का ऐसा पहला राज्य बना जिसने सरकारी और प्राइवेट सेक्टर दोनों के लिए हर महीने 1 दिन की पीरियड लीव अनिवार्य कर दी है।
ओडिशा (2024): ओडिशा सरकार ने भी महिला कर्मचारियों के दर्द को समझा और साल 2024 से हर महीने 1 दिन की छुट्टी की मंजूरी दी।
केरल (छात्राओं के लिए राहत): केरल ने कामकाजी महिलाओं के साथ-साथ छात्राओं पर भी ध्यान दिया है। वहां उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं के लिए न केवल छुट्टी की व्यवस्था है, बल्कि परीक्षा में बैठने के लिए अनिवार्य अटेंडेंस (75%) में 2% की छूट (अब 73%) भी दी गई है।
कॉरपोरेट जगत में बदलती सोच
सरकारी तंत्र के साथ-साथ निजी कंपनियां भी अब इस दिशा में संवेदनशील हो रही हैं। महिलाओं को बेहतर वर्किंग एनवायरमेंट देने के लिए जोमैटो (Zomato), स्विगी (Swiggy) और लार्सन एंड टूब्रो (L&T) जैसी बड़ी कंपनियों ने अपने स्तर पर ‘पीरियड लीव’ पॉलिसी लागू की है।
कानून नहीं, फिर भी मिल रही राहत
भारत में ‘पीरियड लीव’ को लेकर एकसमान राष्ट्रीय नीति का न होना एक बड़ा गैप है। हालांकि, राज्यों की व्यक्तिगत पहल और निजी क्षेत्र का आगे आना यह दर्शाता है कि समाज अब महिलाओं की जैविक जरूरतों को स्वीकार कर रहा है। चुनौती अब सिर्फ छुट्टी देने की नहीं, बल्कि इसे वर्कप्लेस कल्चर का हिस्सा बनाने की है ताकि महिलाओं को इसका लाभ लेने में कोई हिचक न हो।





