आखिर क्यों बिछा होता है सरकारी अफसरों की कुर्सी पर सफेद तोलिया, रुतबे की पहचान या ब्रिटिश विरासत?

किसी भी सरकारी कार्यालय में प्रवेश करते ही सबसे पहली चीज जो ध्यान खींचती है, वह है बड़े अधिकारी की कुर्सी पर करीने से बिछा सफेद तौलिया। हालांकि आज के दफ्तर एसी और आरामदायक रिवॉल्विंग कुर्सियों से लैस हैं, लेकिन यह तौलिया अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। इसके पीछे न केवल व्यावहारिक कारण हैं, बल्कि एक दिलचस्प इतिहास भी छिपा है।
ब्रिटिश शासनकाल की देन
कुर्सियों पर तौलिया बिछाने की प्रथा अंग्रेजों के समय से शुरू हुई थी। उस दौर में अंग्रेज अधिकारी धूल भरी सड़कों पर घोड़ों या खुली गाड़ियों में लंबा सफर तय करते थे।
स्वच्छता और हाइजीन: सफर के बाद अधिकारी जब दफ्तर पहुंचता, तो उसके कपड़ों पर धूल और पसीना होता था। कुर्सी खराब न हो और खुद को साफ रखने के लिए तौलिया उनकी वर्दी और फर्नीचर का अनिवार्य हिस्सा बन गया।
पहचान: धीरे-धीरे यह सफेद कपड़ा एक ‘वर्दी’ की तरह अधिकारी के ओहदे की पहचान बन गया।
पसीने और गर्मी से बचाव का जरिया
80 और 90 के दशक तक सरकारी दफ्तरों में एयर कंडीशनर (AC) विलासिता की वस्तु थे।
साइलेंट वॉरियर: भीषण गर्मी में दफ्तरों के पंखे केवल गर्म हवा देते थे। ऐसे में सूती सफेद तौलिया पसीना सोखने का सबसे अच्छा माध्यम था।
कपड़ों की सुरक्षा: यह अधिकारियों के सफेद या हल्के रंग के कपड़ों को कुर्सी की रगड़ या गंदगी से बचाने का काम भी करता था।
ब्यूरोक्रेसी और पद का प्रतीक
आज के दौर में जब दफ्तरों का बुनियादी ढांचा बदल चुका है, तब यह तौलिया पूरी तरह से ‘स्टेटस सिंबल’ (रुतबे का प्रतीक) बन गया है।
पदानुक्रम (Hierarchy): जिस तरह फाइल पर हस्ताक्षर करने के लिए स्याही का रंग (हरी या लाल) पद तय करता है, उसी तरह कुर्सी पर बिछा तौलिया यह दर्शाता है कि यह स्थान किसी विशेष प्राधिकारी का है।
परंपरा का निर्वहन: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और अन्य उच्च पदों पर इसे एक गरिमापूर्ण शिष्टाचार के रूप में देखा जाता है।
आधुनिकता के बीच परंपरा का संघर्ष
हाल के वर्षों में कुछ युवा अधिकारियों ने इस परंपरा को ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ का प्रतीक मानकर छोड़ना शुरू कर दिया है। कई आधुनिक दफ्तरों में अब केवल आरामदायक गद्देदार कुर्सियां ही नजर आती हैं। हालांकि, अधिकांश सरकारी विभागों में आज भी इसे अनुशासन और व्यवस्था के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखा गया है।





