फैसले पर लगी मुहर; सुप्रीम कोर्ट बोला-हिंदू धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है। शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द करने के फैसले को सही ठहराया है, जिसमें हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वालों को ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ के तहत आरक्षण देने की बात कही थी।
यह पूरी कानूनी बहस इस बात पर केंद्रित थी कि क्या धर्म बदलने के बाद कोई व्यक्ति अपनी पुरानी जाति या नए धर्म के पिछड़े वर्ग के आधार पर आरक्षण का हकदार रह जाता है या नहीं।
क्या था पूरा विवाद?
दरअसल, यह मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक शख्स से जुड़ा है। हिंदू परिवार में जन्मे इस व्यक्ति ने साल 2016 में इस्लामी रीति-रिवाज से निकाह किया। उसके बाद इस्लाम कुबूल कर समीर अहमद बन गया। कायाथार की सुन्नत जमात ने 2015 में उसे धर्म परिवर्तन का प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया था, जिसका फायदा उठाकर उसने खुद को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय का बताकर कम्युनिटी सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर दिया। लेकिन, स्थानीय तहसीलदार ने उसका यह आवेदन ठुकरा दिया, जिसके बाद उसने न्याय के लिए मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने क्यों पलटा था सरकार का आदेश?
• मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि सिर्फ हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लेने भर से किसी को अपने आप ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ का दर्जा नहीं मिल जाता।
• अदालत ने राज्य सरकार के 2024 के उस विवादित सरकारी आदेश को सीधे तौर पर असंवैधानिक करार दिया था, जिसमें कुछ खास पिछड़े वर्गों से इस्लाम में धर्मांतरण करने वालों को मुस्लिम कोटे के तहत आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के इस रुख को एकदम सही माना है।





