
पृथ्वी के दोनों ध्रुव वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के कारण अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंटिफिक डेटा’ में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन ने दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 1979 के बाद से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से लगभग 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ पिघल चुकी है। यदि बर्फ के इस विशाल भंडार की तुलना की जाए, तो यह पूरे अमेरिकी महाद्वीप को लगभग 5 फीट गहरे बर्फ के आवरण से ढकने के लिए पर्याप्त है।
समुद्री जलस्तर पर असर: 1979 से अब तक 1 इंच बढ़ा वैश्विक समुद्र
हिमनदों के पिघलने से उत्पन्न पानी का परिमाण लगभग 11.3 क्वाड्रिलियन लीटर (3 क्वाड्रिलियन गैलन) दर्ज किया गया है। जल के इस अत्यधिक प्रवाह के कारण 1979 से लेकर वर्तमान तक वैश्विक महासागरों के जलस्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर (1 इंच) की बढ़ोतरी हुई है।
अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता और नॉर्थम्ब्रिया विश्वविद्यालय की ग्लेशियोलॉजिस्ट इनेस ओतोसाका के अनुसार, 1 इंच की यह वृद्धि सतही तौर पर मामूली प्रतीत हो सकती है, किंतु इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हैं। समुद्र का स्तर हर एक-तिहाई इंच बढ़ने से दुनिया भर के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले 20 से 30 लाख लोगों के सामने प्रतिवर्ष कम से कम एक बार विनाशकारी बाढ़ का सामना करने का सीधा जोखिम उत्पन्न हो जाता है।
बर्फ पिघलने का वास्तविक कारण: गर्म हवा नहीं, समुद्र का गर्म पानी
वैज्ञानिक अध्ययन में यह नया तथ्य सामने आया है कि हिमनदों के विखंडन के लिए केवल वायुमंडलीय तापमान जिम्मेदार नहीं है।

