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सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर SC की 9 जजों की पीठ करेगी आज सुनवाई

महिलाओं का खतना और मस्जिद में औरतों के नमाज पढ़ने पर भी होगी जिरह

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से इस पर सुनवाई करेगी।

मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी।

सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल की सुबह 10.30 बजे सबरीमाला रिव्यू केस की सुनवाई शुरू होगी। रीव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

9 जजों की बेंच 5 मुद्दों पर सुनवाई करेगी

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: क्या सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है? बेंच यह तय करेगी कि साल 2018 में इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन Vs स्टेट ऑफ केरल मामले में हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं। मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दिए जाने के इस फैसले का रीव्यू करने के लिए मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने याचिका लगाई है, तो कुछ संगठन इसके खिलाफ हैं।

2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है? 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: क्या व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं?

 

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